दोपहर की ढलती धूप कमरे में एक सुनहरी चादर सी बिछा रही थी, और मालती का मन उस धूप से भी ज़्यादा बेचैन था। शंकर की आँखों में आज वो आग थी, जिसकी लपटें मालती ने पहले कभी महसूस नहीं की थीं। उसकी काली, गहरी आँखों में एक अजीब सा आकर्षण था, एक ऐसा न्योता जो हर दबी हुई ख़्वाहिश को उकसा रहा था। मालती जानती थी कि शंकर एक ऐसा मर्द था जिसे लोग दबी ज़ुबान में ‘गुरु घण्टाल’ कहते थे। उसकी आँखों में वो गहरा अनुभव झलकता था जो हर औरत की दबी हुई ख़्वाहिशों को आवाज़ दे सकता था। आज वो अनुभव उसकी आँखों से बढ़कर उसके पूरे वजूद से बोल रहा था।
“आज तुम बहुत ख़ूबसूरत लग रही हो, मालती,” शंकर की आवाज़ रेशम सी फिसलती हुई उसके कानों में घुसी। मालती के गालों पर हल्की लाली तैर गई, दिल की धड़कनें बेतहाशा बढ़ गईं। उसने अपनी पीली साड़ी के पल्लू को कसकर पकड़ा, मानो अपनी भावनाओं को थामने की कोशिश कर रही हो। शंकर धीरे-धीरे उसके पास आया, उसकी हर चाल में एक आत्मविश्वास था, एक बेधड़क अधिकार। कमरे में मोगरे की हल्की खुशबू और उनके बीच बढ़ती वासना की तीखी गंध घुलने लगी थी।
शंकर ने अपना हाथ बढ़ाया और धीरे से मालती के गाल को छुआ। उसका स्पर्श इतना नर्म था कि मालती की आँखों में ख़ुद-ब-ख़ुद मस्ती छा गई। “क्या बात है, मालती? आज तुम्हारी आँखें कुछ और ही कह रही हैं।” उसकी उँगलियाँ उसके गालों से होते हुए गर्दन पर आ गईं, जहाँ से उसने धीरे से साड़ी के पल्लू को हटाया। मालती ने एक गहरी साँस ली, उसकी साँसों में शंकर की मर्दाना ख़ुशबू भर गई। अब वो अपने आप को रोक नहीं पा रही थी।
शंकर ने उसे अपनी बाँहों में खींचा। उनके शरीर के मिलते ही एक बिजली सी मालती के पूरे वजूद में दौड़ गई। शंकर ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वो एक ऐसा चुंबन था जिसने सारी मर्यादाएँ तोड़ दीं, सारी झिझक मिटा दीं। उनके होंठ एक-दूसरे को चूस रहे थे, उनकी ज़ुबानें एक-दूसरे में उलझकर वासना का मीठा रस घोल रही थीं। मालती की उँगलियाँ शंकर के बालों में फँस गईं, और वो और गहराई से उसे चूमने लगी। उसकी साड़ी कब ज़मीन पर गिरी, उसे पता ही नहीं चला। ब्लाउज़ के बटन कब खुले, ये एहसास भी न रहा।
शंकर ने उसे बिस्तर पर धकेला, और ख़ुद उसके ऊपर छा गया। उसकी आँखों में अब पूरी तरह से कामुकता भरी थी। मालती के स्तन उसके सीने से रगड़ खा रहे थे, और हर रगड़ एक नई आग सुलगा रही थी। शंकर ने उसके अधखुले स्तनों को अपने मुँह में भर लिया, और उन्हें एक भूखे आदमी की तरह चूसने लगा। मालती के मुँह से दर्द और आनंद से भरी आहें निकल रही थीं। उसके हाथ शंकर की पीठ पर घूम रहे थे, कभी कसकर पकड़ते, कभी सहलाते।
शंकर एक सिद्धहस्त प्रेमी था, सचमुच का ‘गुरु घण्टाल’। उसके हर स्पर्श में, हर धक्के में, एक ऐसी कला थी जो शरीर के कोने-कोने में कामुकता भर देती थी। उसने मालती के पैरों को उठाया और अपनी कमर के चारों ओर लपेट लिया। अब वो उसके ऊपर था, उसके अधखुले गुप्तांग से अपने मर्दाना अंग को रगड़ रहा था। मालती ने अपनी कमर उचकाई, जैसे उसे और चाहिए था, और शंकर ने बिना देरी किए एक ज़ोरदार धक्के के साथ खुद को उसमें उतार दिया।
“आह्ह्ह्ह्ह्ह!” मालती के मुँह से एक चीख़ निकली, जो पल भर में एक मीठी कराह में बदल गई। उसकी आँखें बंद हो गईं, और उसके शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। शंकर का कठोर अंग उसकी गहराई में समा चुका था, और वो एक अद्भुत अहसास था। शंकर ने धीरे-धीरे लय पकड़ी, उसके हर धक्के के साथ मालती के शरीर में आग सी लगती जा रही थी। वो तेज़ होता गया, और मालती भी अपनी कमर उठाकर उसका साथ देने लगी। उनकी साँसें तेज़ हो गईं, उनके शरीर से पसीना छूटने लगा। कमरे में सिर्फ़ उनके शरीर के टकराने की आवाज़ और वासना भरी आहें गूँज रही थीं।
उनके शरीर एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़ चुके थे, एक-दूसरे में समाए हुए। शंकर की गति और तेज़ हो गई, और मालती भी अपने चरम पर पहुँच रही थी। उसकी आँखें खुलीं, और उसने शंकर की आँखों में देखा। उन आँखों में अब कोई रहस्य नहीं था, सिर्फ़ शुद्ध वासना और आनंद की चमक थी। एक ज़ोरदार धक्के के साथ, मालती ने अपना शरीर सिकोड़ लिया, और उसका सारा शरीर कंपकंपा गया। वो चरम सुख के उस पार पहुँच चुकी थी। शंकर ने भी एक आख़िरी गहरी साँस ली, और उसका गर्म पानी मालती के भीतर छोड़ दिया।
वो उसकी बाँहों में सिमटी रही, अपने शरीर की हर सिहरन को महसूस करती हुई। ‘तुम सचमुच गुरु घण्टाल हो, शंकर,’ उसने बुदबुदाया, एक मीठी थकान और संतुष्टि से भरी हुई। उसकी आवाज़ में अब कोई झिझक नहीं थी, सिर्फ़ असीम तृप्ति थी। शंकर ने उसे कसकर अपने आगोश में भर लिया, जैसे वो उसे कभी जाने नहीं देगा। बाहर धूप ढल चुकी थी, और कमरे में अब सिर्फ़ उनकी प्रेम-क्रीड़ा की खुशनुमा महक फैली थी।
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